मेरी संक्षिप्त जीवनी

मेरा जन्म 18 अगस्त 1974 में महाराष्ट्र के छोटे से गाँव शेलगाव जहांगीर में हुआ। मेरे पिता आयु. भगवान पंडागले सेना में 24 वर्ष सेवा देकर हवलदार मेजर के पद से 1988 में सेवानिवृत्त हुए। 1990 में उन्हें भद्रावती, चंद्रपुर के आर्डिनेंस फैक्ट्री में फायरमैन की नौकरी लगी जिससे वो 2005 में सेवानिवृत्त हुए। पिता जब 11 वी थे तब सेना में भर्ती हुए थे। इन्हें अत्यधिक भावनाशील होने के कारण व्यवहार कभी आया नही।
आयु. लीलावती पंडागले को पति की सेना की नोकरी के कारण अधिकतर गांव में ही रहना पड़ा। मा की पढ़ाई दूसरी तक कि है। भावनाशील होने के साथ व्यावहारिकता भी इनमे है।
दो बहन और चार भाइयो के परिवार में पापा अकेले नौकरी पर थे। तो समझा जा सकता है कि उनके पगार का क्या होता होगा?
मेरी बड़ी बहन विजया तीन साल पहले पोलिस पाटिल बनी। पढ़ाई इन्हें अच्छे से आती थी पर इन्होंने उसे सीरियसली कभी लिया नही। जिसके नतीजे बाद में भुगतने पड़े। छोटा भाई आनंद TGT है। इन्हें पढ़ाई जादा समझ नही आती थी पर हमेशा सीरियस रहे।
जब मैं दो महीनों का था तब गीली साड़ी सुखाने के चक्कर मे माँ जल गई। बड़े पिताजी ने बचाया। फिर भी गंभीर चोटे आयी। उसके बाद से मैं ऊपर के दूध पर ही पला। गाँव मे दूध ना होने के कारण बड़े पिताजी 15 किमी दूर दूसरे गाँव से दूध लाया करते थे। इस परिस्थिति में मेरा लालन पालन मेरी दादी द्रौपदीबाई द्वारा किये जाने के कारण वो मेरी फेवरिट बनी। हम दोनों का एक दूसरे के बगैर पत्ता भी नही हिलता था। मेरे दादा रामभाऊ बहुत स्ट्रिक्ट व्यक्ति थे।
मुझे आज भी वो दिन याद है जब पहली कक्षा में मुझे भर्ती करने के लिए लिया जा रहा था। इधर उधर मैं खूब छुपा पर आखिर में मुझे स्कूल ले जाया गया। टीचर जब रोलर बोर्ड को सीधा कर रहा था तब मुझे लगा टीचर यह क्या कर रहा है? फिर उन्होंने क, ख, ग लिखा। यह सब देखकर अत्यधिक घबरा गया था। इसी दौरान पापा की ट्रांसफर पुणे के पास देहुरोड में हुई। उन्होंने हम सबको बुलाया। 1 ली परीक्षा नजदीक थी और तब तक मुझे पढ़ाई में रुचि आने लगी थी इसलिए मैंने बिना परीक्षा दिए जाने से मना किया। दीदी चली गई। परिणामस्वरूप वो 3 री में फेल हो गई। मेरी दूसरी और तीसरी की पढ़ाई देहूरोड के निकट शेलारवाडी के सरकारी स्कूल में हुई। फिर पापा का ट्रांसफर अम्बाला हुआ। दीदी की आगे की पढ़ाई और मेरी चौथी से सातवी तक कि पढ़ाई गाँव मे हुई। मम्मी और भाई पापा के साथ रहे।
मम्मी को अम्बाला का मौसम और हम दोनों से दूरी रास नही आ रही थी। अतः वो दमा का शिकार हुई। परिस्थिती को ध्यान में रखकर पापा के अलावा हम सब भद्रावती में शिफ्ट हुये। भाई की केंद्रीय विद्यालय भी थी यहाँ। हमारे बगैर पापा का मन नही लग रहा था तो उन्होंने अगला प्रमोशन लेने के बजाय सेवानिवृत्त हो गए। दो साल तक कोई जॉब नही किया। इस दौरान माली हालत बिगड़ गई। हम बड़े हो रहे थे और खर्चा भी।
यहाँ के सरकारी स्कूल में 8 से 10 तक कि पढ़ाई हुई। 10 तक कि पढ़ाई में 2 री और 9 वी छोड़ मैं हर कक्षा में प्रथम रहा। साल भर कभी पढ़ाई नही की पर कक्षा में पूरा ध्यान होता था। सच कहूँ तो इस पढ़ाई में कोई चैलेंज नही था मेरे लिए। 10 वी 81% से पास की। स्कूल में प्रथम और तहसील में द्वितीय रहा। उस समय 75% से ज्यादा मार्क्स लाना बड़ी बात हुआ करती थी।
इलेक्ट्रॉनिक्स का बड़ा बोलबाला था तब। अतः बाबा आमटे जी के आनंद निकेतन कॉलेज, वरोरा में इलेक्ट्रॉनिक्स में प्रवेश लिया। कुछ दिनों बाद पता चला कि इससे तो केवल इंजीनियर बना जा सकता है जो मुझे बनना नही था। टीचर द्वारा ली गई पहली टेस्ट में 20 में से 2.5 मार्क्स मिले। मैं और मेरा दोस्त, डॉ उमेश पालिकुण्डवार, asst profe, नागपुर यूनिवर्सिटी कैंपस, दोनों घबरा गए। पर मैने उसे समझाया कि अब तक हम मराठी मीडियम में थे अब इंग्लिश में है तो समय लगेगा। मुझे मीडियम से खास फरक नही पड़ा था क्योंकि इंग्लिश पर मेरी पकड अच्छि थी। खैर… समय बीतता गया। 12 वी हो गई। इंजीनियरिंग करनी नही थी तो B Sc में वही पर एडमिशन ले लिया। वो भी जैसे तैसे हो गई। सच कहें तो इस समय मेरी दिशाभूल हो गई थी। समझ नही आ रहा था कि पढ़ क्यो रहा हु?
इसी दौरान एक झगड़े के कारण कुंग फू सीखना शुरू किया। अच्छि महारत भी हासिल हुई। B Sc के बाद उमेश M Sc के लिए नागपुर चला गया। मेरे एक टीचर ने मुझ से कहा था कि तेरे आगे की पढ़ाई का खर्चा मैं वहन करूंगा। पर घर की माली हालत को देखकर मैंने कुंग फू क्लासेस शुरू करना उचित समझा। सोचा था कि एक साल क्लासेस चलाऊंगा और अगले वर्ष B Ed कर लूंगा। पर यह सिलसिला दो वर्ष चला। बुलढाना (मेरा जिला) में मेरी 10 जगहों पर क्लासेस थी। खूब नाम हुआ। पैसा भी ठीकठाक आता था। फिर मैंने सोचा कि यह कबतक कर पाऊंगा? पढ़ाई से कोसो दूर हो गया था। बस कुंग फू ही था दिमाग मे।
फिर वो समय आया (1997) जब मेरा एडमिशन B Ed के लिए नागपुर के यूनिवर्सिटी कॉलेज में हो गया। होस्टल में आया। एक साल B Ed खत्म करके वापस जाने के इरादे से आया था। वापस गया भी। पर बिना donation के नौकरी कही नही थी। होस्टल के एक साल के वास्तव्य में यह ध्यान में आया कि मैं मेरी प्रतिभा का अपव्यय कर रहा हु। कुछ मित्र, जिनके पास अधिक प्रतिभा ना होते हुए भी मेहनत से कुछ ना कुछ हासिल कर रहे है। अतः मैंने M Ed में एडमिशन लिया वो भी यूनिवर्सिटी कॉलेज ही था। उद्देश्य केवल यह था कि एक साल में PG हो जाएगा और कही ना कही B Ed कॉलेज में 3-4 हजार की नौकरी मिल जाएगी। पर M Ed के अंतिम दिनों ने सोचने के लिए मजबूर किया कि क्या 10 वी की सफलता एक तुक्का थी या यही असलियत है? अतः आखरी 5 दिनों में जबरदस्त मेहनत की। परिणामस्वरूप यूनिवर्सिटी सेकंड और कॉलेज टॉपर रहा। वो dissertation में सेकंड लास्ट highest मार्क्स मिले वर्ना यूनिवर्सिटी टॉपर होता। खैर… statistics में 80 में से 80 मार्क्स मिले। educational टेक्नोलॉजी में भी काफी अच्छे मार्क्स थे।
M Ed के दौरान ही मैंने एक कोचिंग क्लास में काम करना शुरू किया। साईकल (सामान्य ज्ञान परीक्षा में पुरस्कारस्वरूप प्राप्त) से 6 किमी जाना और उतना ही वापस जाना। रवि नगर से वायुसेना नगर होते हुए आकार नगर जाना होता था। बीच मे काफी चढ़ाई थी। खैर… सुबह और शाम दो बार जाना पड़ता था।
M Ed तो हो जाएगा उसके बाद क्या करना? इसलिए M Ed के दौरान additional B A किया english literature में। M Ed के बाद M A English में एडमिशन लिया कैंपस में। इस वर्ष (1999-2000) पॉलीटेक्निक के स्टडी सेंटर में जॉब मिली रामदास पेठ में। यहाँ तीन बार जाना पड़ता था 2-2 घन्टो के लिए। बचा हुआ समय कॉलेज जाने, होस्टल में खाना बनाने, कोचिंग के पेपर चेक करने और 12 के एक बच्चे की ट्यूशन लेने में जाता था। यह शायद कम था कि होस्टल वालो ने स्टूडेंट्स एसोसिएशन का अध्यक्ष भी बना दिया। यह अध्यक्ष यूनिवर्सिटी की अलग अलग चार होस्टल्स को मिलकर चुना जाता था जिसमे गर्ल्स होस्टल्स भी शामिल थी। खैर… सुबह 5 से रात 1 बजे तक काम चलता था। आज, जब भी कभी थकान महसूस करता हु तो यह एक वर्ष मुझ में हमेशा ऊर्जा संचारित करता है।
मेरा एडुकेशन में NET december 1999 में हुआ फिर प्राइवेट B Ed कॉलेज में नौकरी लगी। साथ मे M A English चल रहा था। दरमियाँ मैंने additional B A भी कर लिया history में। अगले वर्ष फिर अच्छे नौकरी की तलाश शुरू हो गई। अब तक english MA हो गया था। अमरावती में चिखलदरा स्थित मिलिट्री स्कूल के इंटरव्यू के लिए गया उसमे मेरा चयन हो गया TGT Maths के लिए। यह बिना donation का जॉब था। यहाँ रहकर मैंने additional B Ed (Eng) में पूरा किया और M A History का प्रथम वर्ष भी। इनकी परीक्षाओं के लिए 235 किमी और करीबन 10 घंटो का सफर तय करना पड़ता था क्योंकि सेंटर नागपुर था।
जनवरी 2002 में NCERT का कॉल आया। कोई तैयारी नही थी। एडुकेशन लगभग भूल चुका था। सोचा NCERT की इंटरव्यू कैसी होती है यही देखकर आऊंगा। इंटरव्यू 70-80% ठीक रही। कुछ दिनों बाद लेटर आया कि मुझे NCERT में RIE Bhopal के लिए चुन लिया गया है। जाहिर है खुशी का ठिकाना नही रहा होगा। जनवरी में सिलेक्शन हुआ पर जॉइन करते करते सितंबर हो गया। दरमियाँ KVS की PGT Eng भी मैंने क्लियर कर ली थी। पर वर्तमान जॉब में केवल जॉइन करना बाकी था इसलिए मैंने उसका इंटरव्यू नही दिया।
16 सितंबर को RIE में जॉइन किया। यहाँ से नागपुर आना जाना करके M A History पूरा किया।
मई 2003 में शादी हुई। डॉ प्रविनि की पढ़ाई मुझसे भी जादा है। हर मामले में वो एक काबिल इंसान है। मेहनत करने की प्रेरणा मुझे उनसे ही मिलती है।
2004 में महक आई। गाना बहुत अच्छा गाती है। इंग्लिश पर मजबूत पकड़ है। और भी बहुत सी खूबियां है में। अपने नाम के जैसे महकते रहती है। अभी 8 वी में है।
प्रजय का आगमन 2007 में हुआ। पढ़ाई में तेज है पर करने का मन नही होता इनका। अबतक टॉपर्स में ही रहे है। 4 में आते आते कई सर्टिफिकेट्स प्राप्त कर लिए है। एक बार साइंस ओलिंपियाड जीता और दो बात स्पेल बी कंपीटिशन में स्टेट लेवल तक पहुंच चुके है। इस बार नेशनल का ध्येय है। खेल के प्रति दीवानगी है। दोनों ही टेक्नोलॉजी के दीवाने भी है।
मैं अपनी सम्पूर्ण जिंदगी से बहुत खुश हूं। कही कोई गिला शिकवा नही है। समाज के लिए जो भी कर सकता हु करने की कोशिश करता हु। मैं जो कुछ भी हु आज वो नागपुर के होस्टल के कारण हु और इस समाज के….

बाकी की लाइफ लगभग आप लोग जानते ही हो। कोई सवाल हो तो बेझिझक पूछिये।
धन्यवाद! (पढ़ने के लिए बहुत समय लगेगा।)

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About Dr. Sanjay Kumar Pandagale

I am an Assistant Professor in Education in NCERT presently posted at Regional Institute of Education Bhopal which is a constituent unit of National Council of Educational Research and Training, New Delhi. Since last 14 years, I am working here in different capacities like, State Coordinator of Maharashtra and Goa, In-charge of Educational Technology Cell, In-charge of Information and Communication Center, Coordinator of Working With Community programme and Coordinator of EDUSAT programme. State Coordinator of Maharashtra for Research Study on SSA, Member of monitoring team for Chhattis Garh on SSA, Team member of National Achivement Surey (NAS). I visited Kunming, China in 2007 to attend workshop on ICT sponsored by UNESCO Bangkok. In 2008, I attended II workshop on ICT at Brunei Darussalem. Recently, in January 2013, I visited United Kingdom. During my seven days study tour, I visited Nottingham, London and Bristol.
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One Response to मेरी संक्षिप्त जीवनी

  1. Shireesh says:

    Bahut acha

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