सही श्रद्धान्जलि

बुद्धवासी द्रौपदीबाई पंडागले (मेरी दादी) का देहांत ६ नवम्बर २०१५ को हुआ। उस समय उनकी आयु ९५ के करीब थी। उनके अंतिम समय में बड़े पिताजी का परिवार, मेरा परिवार तथा बड़ी बुवां ने उनकी सेवा की। अन्य सदस्य गांव से दूर होने के कारन चाह कर भी उनकी सेवा नहीं कर पाये उनमे मैं भी शामिल हु।

आज उनकी प्रथम बरसी है। पापा और उनके भाई (मेरे चाचा और ताऊ) चाहते है की आज के दिन समाज के लोगो को खाना खिलाया जाये। इस संदर्भ में मेरी बात मेरे भाई (आनंद) से हुई। उसने जो कहा उससे मैं सोचने पर मजबूर हो गया, हालाँकि मेरी भी यही सोच है फिर भी।

आनंद : भाई उनके मृत्यु के पहले जो करना था किया। अब किसी को खाना खिलाने से क्या हांसिल होगा? मैं तो इस बात के खिलाफ हु। उससे अच्छा उनके नाम पर गांव के स्कूल को कुछ रकम योगदान के रूप में दी जा सकती थी। मेरी हालत इतनी अच्छी नहीं अभी वर्ना मैं ही यह घोषित कर देता।

उसकी बात में दम तो था। मैंने सोचा, वो नहीं तो मैं सही। अत: मैं यह घोषित करना चाहता हु की मेरे गांव की स्कूल, जहा मैं भी पढ़ा हु, में हर कक्षा में प्रथम आने वाले को कुछ रकम प्रोत्साहन के रूप में दी जाए। इसका सारा खर्च मैं वहन करूँगा। इस योजना का नाम हो ‘द्रौपदीबाई पंडागले पुरस्कार’।

माना की यह निर्णय भावनिक है। पर यह भी मानता हु की हर भावनिक निर्णय गलत नहीं होता। साथ ही यह भी कहना चाहता हु की जब मैं इस दुनिया को अलविदा कहु मेरे नाम से भी ऐसा ही कोई पुरुस्कार दिया जाए जिससे समाज का भला हो। बाकी किसी कर्मकांड की जरुरत नहीं।

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Pandagale family dance on Zingaat song…

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इतना नादाँ भी नहीं

इतना नादाँ भी नहीं की समझ ना सकु
पर अपनों से ठोकर खाना गवारा नहीं मुझे।

कभी हमारी छोटी सी ख़ुशी पर कितना इठलाते थे वो
आज असीम दुःख की सुध भी नहीं उन्हें।

विश्वास पे तो दुनिया कायम है
हमने किया तो क्या बुरा किया?

होंगी उनकी भी कुछ मजबूरिया
पर वाकई हमारे समझ से परे है वे।

समय ने बहुत कुछ सिखाया अब तक
चलो इस सिख को भी आजमा ही लेते है।

इतना नादाँ भी नहीं की हां में हां मिला ना सकु
पर अपनों को ठोकर खाते देखना गवारा नहीं मुझे।

  • संजय कुमार पंडागले
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अंधविश्वासी महिलाओं की गोद भरता बाबा

विगत दिनो लखनऊ के करीब बाराबंकी में एक संत बाबा परमांनंद उर्फ राम शंकर तिवारी उम्र लगभग 65 वर्ष सुर्खियों मे है। उन पर आरोप है की उसने महिलाओं की गोद भरने की आड़ में बलात्कार किया और उनकी सेक्स वीडियो बनाया। ये भेद न खुलता यदि उसका लेपटाप खराब न होता। कम्पयूटर इंजीनियर ने जब लैपटॉप सुधारने के दौरान उस वीडियो क्लिप को देखा तो हैरान रह गया। उसमे करिब 200 महिलओं के साथ सेक्स वीडियो थे। उसने कुछेक वीडियो को सोशल साईट पर अपलोड कर दिया। इसके बाद हल्ला  मचा और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। सोशल मीडिया मे तैर रहे इन तमाम वीडियो मे से कुछ वीडियो को देखने के बाद मन विचलित हो जाता है और मन सोचने के लिए मजबूर होता है कि हमारा जन समुदाय किस ओर जा रहा है। हमारी शिक्षा का क्या औचित्य है?

गौरतलब है कि बाबा परमानंद संतान प्राप्ति सुख देने के लिए विख्यात है खास कर पुत्र प्राप्ति हेतु। दावा है कि वैदिक रीति से तंत्र–मंत्र की साधना करते है। कई केन्द्रीय और राज्य  के मंत्री  उनके मुरीद है। उनके आश्रम (अय्याशगाह) में लगी इन हस्तियो के साथ तस्वीर को देखने से उनके राजनीतिक और समाजिक हैसियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। इन वीडियो को देखने से कही से भी ये नही लगता की यह कोई बलात्कार है, ऐसे ही एक वीडियो में एक युवती अपने अद्योवस्त्र उतारा रही है और बाबा परमानंद के अंत:वस्त्र उतारने में मदद कर रही है। बाबा लेटे हुये है युवती मुख मैथुन कर रही है। तत्पश्चात बाबा उसे बाकी वस्त्र  भी उतारने का इशारा करते है वह बिना संकोच शेष वस्त्र  भी उतार देती है। गौर तलब है की इसी दरमियान भजन गायन की ध्वनी सुनाई पड़ रही है। महसूस होता है की दूसरे कमरे मे काफी लोग भजन गा रहे है और बीच बीच मे देवी देवताओं, बाबा परमानंद की जय के नारे भी  लगा रहे है। इसी बीच बाबा युवती को अपने उपर आने का इशारा करते है उसके नाज़ुक अंगो को छेड़ते है बाद में बाबा युवती के उपर आ जाता है। करीब 24 मिनट के इस वीडियो में मैथुन पश्चात बाबा खड़ा हो जाता है युवती उसे उसके अंत:वस्त्र पहनने के लिए देती है और अपने अंत:वस्त्र पहनती है। बताना चाहूंगा की महिला के वस्त्र  पहनने के दौरान लेटा हुआ बाबा उसके नाजुक अंगो मे, सिर व चहरे पर लात फेर रहा है। मानो वह कोई पालतु जानवर हो। आश्रम का वह कमरा जहां यह स्केण्डल हो रहा है निहायत ही छोटा है देवी देवताओं की तस्वीर और धार्मिक किताबों से अटा पड़ा है। किताबों के बीच लगे सी सी टीवी कैमरे से ये सब सूट किया जा रहा था। यह सब विस्तांर से बताने का मकसद यह है की वीडियो में कोई जोर जबरदस्ती नही है, जैसा की प्रचारित किया जा रहा है। अन्य  वीडियो मे भी इसी प्रकार की प्रक्रिया नजर आती है। महिला बदल जाती है कभी सलवार सूट मे तो कभी साड़ी मे। ये वीडियो इस लिए विचलित कर देने वाला है क्योकि बाबा परमानंद के साथ सेक्स  कर रही महिलाएं कोर्इ सेक्स वर्कर नही है, आम उच्च  मध्यम परिवार की है। बावजूद इसके वे इसका विरोध नही कर रही है इस लिहाज से बाबा आरोपी बिल्कुल भी नही क्योकि कानून, सहमती के साथ किये गये संबंध की इज़ाजत देता है।

यह सब ऐसे देश मे हो रहा है जहां महिलाएं घर से बाहर अकेले नही  निकलती। कोई अगर घूर कर देख भी ले तो लोग मरने माने को उतारू हो जाते है। निश्चय ही बाबा के आश्रम में आने के लिए उस महिला ने अपनी मां, बहन, भाई, सास, ननद, पति, देवर, देवरानी, जेठानी का सहारा लिया होगा। यानि उस दौरान जब वो बाबा के साथ समागम कर रही होगी तब निहायत ही करीबी रिश्तेदार बगल के कमरे में बाबा परमानंद की जय के नारे लगा रहा होगा या भजन में लीन रहा होगा।

यह तो तय है की ये घटना पहली नही है नही ये घटना आखरी है। क्योकि जब तक धर्म के लिए अंधभक्ति रहेगी। तब तक आशाराम, परमानंद, नित्या नंद जैसे लोग अपनी इच्छा तृप्ती करते रहेगे। गौर तलब है की ये समस्या किसी विशेष धर्म तक सीमित नही है धर्म के ठेकेदार किसी न किसी रूप से अपने भक्तो  का शारीरिक मानसिक एवं आर्थिक शोषण करते रहते है।

क्यो होता है ऐसा?

ऐसे समय जब पाश्चात्य विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है। एक ओर भारत मे ही 70 वर्ष की महिला को चिकित्सा  विज्ञान के सहारे संतान सुख प्राप्त होने के उदाहरण मौजूद है। वहीं दूसरी ओर एक मर्द को भी बच्चे जन्म  देने का मौका मिल चुका है। ऐसी स्थिति में भारत में आये दिन ऐसी खबरे आना दुखद है। भारत का जनमानस अंधविश्वास से उबर नही पा रहा है। प्रशासन को इस पर गहराई के विचार करना होगा। हमे यह सोचने पर महबूर होना होगा की हमारी शिक्षा का क्या औचित्य है? क्या हम धार्मिक अंधविश्वास के तले आधुनिक शिक्षा को रौद रहे है? संत बाबा परमानंद से समागम करती ये महिलाएं खूबसूरत है संभ्रात परिवार की लगती है। निश्चिय ही वे पढ़ी लिखी होगी उनका परिवार भी शिक्षित होगा। तो फिर उस परिवार ने कैसे संतान प्राप्ती के लिए झाड़ फूक यज्ञ हेतु अपनी महिलाओं को सौप दिया।

पहलू और भी है
ऐसे देश पर जहां महिलाओं पर अत्यंत रोक टोक की जाती है उन्हे महिनो चाहर दिवारी मे कैद रखा जाता हे वही दूसरी ओर ऐसे आश्रमो में जाने की खुली छूट रहती है। भारत में आज भी संतान के लिए महिलाओं को जिम्मेदार माना जाता है, नि:संतान होने पर तरह तरह से जलील किया जाता है। यातनाएं दी जाती है।
पारिवारिक, समाजिक तानो से उसका जीवन नर्क बना दिया जाता है। इन वीडियो को देखने से लगता है कि इन नरक भरी ज़िन्दगी से उबरने के लिए यदि किसी महिला को ये सब करना पड़ रहा हो, तो शायद इतना बुरा  नही है। जिना समझा जाता रहा है क्योकि ऐसा करने के लिए उसी के परिवार ने, समाज ने मजूबर किया है।
यह अप्रकाशित आलेख आपको प्रकाशन के लिए भेज रहा हूँ, लेख के साथ मेरा ईमेल भी प्रकाशित करेगे तो मुझे खुशी होगी।

भवदीय
संजीव खुदशाह
Sanjeev Khudshah
http://www.sanjeevkhudshah.com/
(संक्षिप्त परिचय:-संजीव खुदशाह का जन्म 12 फरवरी 1973 को बिलासपुर छत्तीसगढ़ में हुआ। आपने एम.ए. एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की। आप देश में चोटी के दलित लेखकों में शुमार किये जाते है और प्रगतिशील विचारक, कवि,कथा कार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते है। आपकी रचनाएं देश की लगभग सभी अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। “सफाई कामगार समुदाय” एवं “आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग”  आपकी चर्चित कृतियों मे शामिल है। आपकी किताबें मराठी, पंजाबी, एवं ओडिया सहित अन्य भाषाओं में अनूदीत हो चुकी है। आपकी पहचान मिमिक्री कलाकार और नाट्यकर्मी के रूप में भी है। आपको देश के नामचीन विश्वविद्यालयों द्वारा व्याख्यान देने हेतु आमंत्रिीत किया जाता रहा है। आप कई पुरस्कािर एवं सम्मान से सम्मानित किए जा चुके है।)

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शादी: कुछ सोचनीय सवाल

हमारे देश में वैसे तो कई त्यौहार तथा प्रसंग बड़े धूम धाम से मनाए जाते है। पर शादिया शायद कुछ जादा ही धुमधाम से मनाई जाती है। केवल सामान्य धूमधाम ही नहीं, शादियों में रीती रिवाजो की भी धूमधाम होती है। ऐसे में कई सवाल मन में आते है। हमने कई दिनों से किसी विषय पर चर्चा नहीं की। तो क्यों ना आज इसी पर चर्चा की जाये। चर्चा के लिए कुछ मुद्दे छोड़े जा रहा हु। जब समय होगा मेरे पास तो मैं भी जुड़ जाऊंगा चर्चा में। इस विषय के मुद्दे बनाने में ही काफी समय लग गया मुझे। अत: इसे केवल चर्चा की दृष्टी से ही ना देखे। क्योंकि केवल हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ….. बाकी आप सब समझदार हो। चर्चा के मुद्दे कुछ इस तरहा से है –

१. शादी सबकी सुविधा ध्यान में रखकर करनी चाहिए या शुभ मुहूर्त देख कर?

२. शुभ मुहूर्त कैसे देखा जाता है? मतलब इसका आधार क्या है?

३. लड़की की महत्वपूर्ण परीक्षा है शिक्षा की फिर मुहूर्त के नाम पर परीक्षा के दरमियान शादी करना, कहा तक उचित है?

४. शादी में दहेज़ देना या लेना जरुरी है क्या?

५. दहेज़ लेकर दूल्हे को अपने बिकने का अहसास नहीं होता होगा क्या?

६. जब शादी ऊपर वाला तय करता है तो फिर दहेज़ देना या लेना क्यों? शुभ मुहूर्त की भी जरुरत क्यों?

७. कुंडली देखना जरुरी है क्या? अगर हा, तो इसके कारन बताइए।

८. क्या भारत में कभी भी आसानी से किसी भी जाती में शादी करना संभव हो पाएगा?

९. शादी के बाद आदमी में तो कोई परिवर्तन नहीं लाया जाता तो फिर महिला में ही क्यों? जैसे की दोनों हाथो में कोहनी तक चूड़िया, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, आदि। क्या महिला को यह गुलामी की निशानी नहीं लगती होगी? या उसने इस बात पर कभी गौर ही नहीं किया? या यह एक उचित रिवाज है?

१०. घर में किसी की मृत्यु हो जाए तो शादी को एक साल तक आगे धकेलना, फिर किसी और की मृत्यु हो जाये तो फिरसे आगे धकेलना। ऐसे में खास कर लड़की के शादी पर कोई दुष्परिणाम तो नहीं होता होगा?

११. शादी में शामिल मेहमानों को खाना खिलाने के अलावा अन्य चकाचौंध और खर्चे जरुरी है क्या?

१२. शादी दो परिवारों के बिच होती है। आदमी और औरत दोनों की आवशकता है। तो फिर लड़की वालो को ही क्यों झुकना पड़ता है ?

१३. शादी तो लड़की की भी होती है तो उसे जीवन भर जिसके साथ रहना है उसे चुनने का अधिकार उसे क्यों नहीं दिया जाता?

और भी ऐसे कई सवाल मेरे मन में अक्सर उठते रहते है। यह सवाल मेरे वैयक्तिक सवाल है जो समाज को अवलोकित करने के पश्चात मेरे मस्तिष्क में उठते रहते है। ये रीतिरिवाज किसी एक जाती विशेष या समुदाय विशेष से जुड़े हुए नहीं है। अपितु सम्पूर्ण भारतीय समाज से जुड़े है। अत: इनके जवाब कृपया भावना में बहकर नहीं परन्तु तर्क के आधार पर दे। किसी भी जाती का उल्लेख ना करे। और केवल जवाब देकर शांत ना बैठे। हो सके तो इन्हे अपने जीवन में ढाले।

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मृतदेह का आत्मकथन

निम्नलिखित आत्मकथन मराठी में था। मुझे अच्छा लगा तो इसका हिंदी में अनुवाद कर दिया। काफी समय लगा इसे अनुवादित करने मे। अत: एक बार अवश्य पढ़िए। जिसने भी लिखा है क्या खूब लिखा है।

जब तक था देह में प्राण, कोई नहीं था ढुंक कर देखने को।
आज जब प्राण ही नहीं बचा, तब सब आये है देखने को।।1।।

ना था कोई रोनेवाला मेरे संग ना ही कोई हँसाने को।
आज जब शान्ति से सो गया हु मुक्त होकर, सब आये क्रन्दन करने को।।2।।

आज देखिये क्या थाट होगा मेरा, लोग जमा होकर मुझे स्नान करायेंगे।
जिंदगी भर नही देखा कभी कपडा, आज नये सफेद शुभ्र वस्त्र मुझे पहनायेंगे।।3।।

जब भूका था रात रात, नहीं था कोई एक निवाला खिलाने को।
आज जब भूक मर गई है मेरी मेरे ही साथ, रखा है चावल मेरे लिए पकाने को।।4।।

जिंदगी भर जो लाते मारते रहे, आज आये है मेरे पांव छूने को।
शब्द का नहीं दिया आधार कभी, आज आये है चार लोग कांधा देने को ।।5।।

आज क्या कीमत उस रोने को? आज क्या कीमत उस छाती पीटने को?
जिस घर में आज कोई रहता ही नहीं, आज क्या कीमत उस में गृहप्रवेश करने को ।।6।।

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मेरे विचार

अपने दोस्त और दुश्मन दोनों को कभी भी ना छोडो। दोनों में से किसी को भी छोड़ोगे तो बहुत कुछ खोना पड सकता है। जरुरी नहीं की जो आपके साथ हमेशा रहता है वो आपका बहुत अच्छा दोस्त हो और ये भी जरुरी नहीं की जो आपसे कोसो दुरी पे हो वो आपका दुश्मन ही हो।।

यह विचार सीधे अनुभवो से प्राप्त है, चोरी के नहीं है।

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