एक विचार

जो कभी व्यवहार में थे नही उन्हें आदर्श बना दिया,
जो आदर्श थे उन्हें कभी व्यवहार में लाया ही नहीं।

क्या खाक तरक्की करेगा देश? हम विकसनशील (developing) थे, है और रहेंगे। क्योकि हम परंपरा में विश्वास रखते है और विकसनशीलता हमारी परंपरा बन चुकी है।

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मेरी संक्षिप्त जीवनी

मेरा जन्म 18 अगस्त 1974 में महाराष्ट्र के छोटे से गाँव शेलगाव जहांगीर में हुआ। मेरे पिता आयु. भगवान पंडागले सेना में 24 वर्ष सेवा देकर हवलदार मेजर के पद से 1988 में सेवानिवृत्त हुए। 1990 में उन्हें भद्रावती, चंद्रपुर के आर्डिनेंस फैक्ट्री में फायरमैन की नौकरी लगी जिससे वो 2005 में सेवानिवृत्त हुए। पिता जब 11 वी थे तब सेना में भर्ती हुए थे। इन्हें अत्यधिक भावनाशील होने के कारण व्यवहार कभी आया नही।
आयु. लीलावती पंडागले को पति की सेना की नोकरी के कारण अधिकतर गांव में ही रहना पड़ा। मा की पढ़ाई दूसरी तक कि है। भावनाशील होने के साथ व्यावहारिकता भी इनमे है।
दो बहन और चार भाइयो के परिवार में पापा अकेले नौकरी पर थे। तो समझा जा सकता है कि उनके पगार का क्या होता होगा?
मेरी बड़ी बहन विजया तीन साल पहले पोलिस पाटिल बनी। पढ़ाई इन्हें अच्छे से आती थी पर इन्होंने उसे सीरियसली कभी लिया नही। जिसके नतीजे बाद में भुगतने पड़े। छोटा भाई आनंद TGT है। इन्हें पढ़ाई जादा समझ नही आती थी पर हमेशा सीरियस रहे।
जब मैं दो महीनों का था तब गीली साड़ी सुखाने के चक्कर मे माँ जल गई। बड़े पिताजी ने बचाया। फिर भी गंभीर चोटे आयी। उसके बाद से मैं ऊपर के दूध पर ही पला। गाँव मे दूध ना होने के कारण बड़े पिताजी 15 किमी दूर दूसरे गाँव से दूध लाया करते थे। इस परिस्थिति में मेरा लालन पालन मेरी दादी द्रौपदीबाई द्वारा किये जाने के कारण वो मेरी फेवरिट बनी। हम दोनों का एक दूसरे के बगैर पत्ता भी नही हिलता था। मेरे दादा रामभाऊ बहुत स्ट्रिक्ट व्यक्ति थे।
मुझे आज भी वो दिन याद है जब पहली कक्षा में मुझे भर्ती करने के लिए लिया जा रहा था। इधर उधर मैं खूब छुपा पर आखिर में मुझे स्कूल ले जाया गया। टीचर जब रोलर बोर्ड को सीधा कर रहा था तब मुझे लगा टीचर यह क्या कर रहा है? फिर उन्होंने क, ख, ग लिखा। यह सब देखकर अत्यधिक घबरा गया था। इसी दौरान पापा की ट्रांसफर पुणे के पास देहुरोड में हुई। उन्होंने हम सबको बुलाया। 1 ली परीक्षा नजदीक थी और तब तक मुझे पढ़ाई में रुचि आने लगी थी इसलिए मैंने बिना परीक्षा दिए जाने से मना किया। दीदी चली गई। परिणामस्वरूप वो 3 री में फेल हो गई। मेरी दूसरी और तीसरी की पढ़ाई देहूरोड के निकट शेलारवाडी के सरकारी स्कूल में हुई। फिर पापा का ट्रांसफर अम्बाला हुआ। दीदी की आगे की पढ़ाई और मेरी चौथी से सातवी तक कि पढ़ाई गाँव मे हुई। मम्मी और भाई पापा के साथ रहे।
मम्मी को अम्बाला का मौसम और हम दोनों से दूरी रास नही आ रही थी। अतः वो दमा का शिकार हुई। परिस्थिती को ध्यान में रखकर पापा के अलावा हम सब भद्रावती में शिफ्ट हुये। भाई की केंद्रीय विद्यालय भी थी यहाँ। हमारे बगैर पापा का मन नही लग रहा था तो उन्होंने अगला प्रमोशन लेने के बजाय सेवानिवृत्त हो गए। दो साल तक कोई जॉब नही किया। इस दौरान माली हालत बिगड़ गई। हम बड़े हो रहे थे और खर्चा भी।
यहाँ के सरकारी स्कूल में 8 से 10 तक कि पढ़ाई हुई। 10 तक कि पढ़ाई में 2 री और 9 वी छोड़ मैं हर कक्षा में प्रथम रहा। साल भर कभी पढ़ाई नही की पर कक्षा में पूरा ध्यान होता था। सच कहूँ तो इस पढ़ाई में कोई चैलेंज नही था मेरे लिए। 10 वी 81% से पास की। स्कूल में प्रथम और तहसील में द्वितीय रहा। उस समय 75% से ज्यादा मार्क्स लाना बड़ी बात हुआ करती थी।
इलेक्ट्रॉनिक्स का बड़ा बोलबाला था तब। अतः बाबा आमटे जी के आनंद निकेतन कॉलेज, वरोरा में इलेक्ट्रॉनिक्स में प्रवेश लिया। कुछ दिनों बाद पता चला कि इससे तो केवल इंजीनियर बना जा सकता है जो मुझे बनना नही था। टीचर द्वारा ली गई पहली टेस्ट में 20 में से 2.5 मार्क्स मिले। मैं और मेरा दोस्त, डॉ उमेश पालिकुण्डवार, asst profe, नागपुर यूनिवर्सिटी कैंपस, दोनों घबरा गए। पर मैने उसे समझाया कि अब तक हम मराठी मीडियम में थे अब इंग्लिश में है तो समय लगेगा। मुझे मीडियम से खास फरक नही पड़ा था क्योंकि इंग्लिश पर मेरी पकड अच्छि थी। खैर… समय बीतता गया। 12 वी हो गई। इंजीनियरिंग करनी नही थी तो B Sc में वही पर एडमिशन ले लिया। वो भी जैसे तैसे हो गई। सच कहें तो इस समय मेरी दिशाभूल हो गई थी। समझ नही आ रहा था कि पढ़ क्यो रहा हु?
इसी दौरान एक झगड़े के कारण कुंग फू सीखना शुरू किया। अच्छि महारत भी हासिल हुई। B Sc के बाद उमेश M Sc के लिए नागपुर चला गया। मेरे एक टीचर ने मुझ से कहा था कि तेरे आगे की पढ़ाई का खर्चा मैं वहन करूंगा। पर घर की माली हालत को देखकर मैंने कुंग फू क्लासेस शुरू करना उचित समझा। सोचा था कि एक साल क्लासेस चलाऊंगा और अगले वर्ष B Ed कर लूंगा। पर यह सिलसिला दो वर्ष चला। बुलढाना (मेरा जिला) में मेरी 10 जगहों पर क्लासेस थी। खूब नाम हुआ। पैसा भी ठीकठाक आता था। फिर मैंने सोचा कि यह कबतक कर पाऊंगा? पढ़ाई से कोसो दूर हो गया था। बस कुंग फू ही था दिमाग मे।
फिर वो समय आया (1997) जब मेरा एडमिशन B Ed के लिए नागपुर के यूनिवर्सिटी कॉलेज में हो गया। होस्टल में आया। एक साल B Ed खत्म करके वापस जाने के इरादे से आया था। वापस गया भी। पर बिना donation के नौकरी कही नही थी। होस्टल के एक साल के वास्तव्य में यह ध्यान में आया कि मैं मेरी प्रतिभा का अपव्यय कर रहा हु। कुछ मित्र, जिनके पास अधिक प्रतिभा ना होते हुए भी मेहनत से कुछ ना कुछ हासिल कर रहे है। अतः मैंने M Ed में एडमिशन लिया वो भी यूनिवर्सिटी कॉलेज ही था। उद्देश्य केवल यह था कि एक साल में PG हो जाएगा और कही ना कही B Ed कॉलेज में 3-4 हजार की नौकरी मिल जाएगी। पर M Ed के अंतिम दिनों ने सोचने के लिए मजबूर किया कि क्या 10 वी की सफलता एक तुक्का थी या यही असलियत है? अतः आखरी 5 दिनों में जबरदस्त मेहनत की। परिणामस्वरूप यूनिवर्सिटी सेकंड और कॉलेज टॉपर रहा। वो dissertation में सेकंड लास्ट highest मार्क्स मिले वर्ना यूनिवर्सिटी टॉपर होता। खैर… statistics में 80 में से 80 मार्क्स मिले। educational टेक्नोलॉजी में भी काफी अच्छे मार्क्स थे।
M Ed के दौरान ही मैंने एक कोचिंग क्लास में काम करना शुरू किया। साईकल (सामान्य ज्ञान परीक्षा में पुरस्कारस्वरूप प्राप्त) से 6 किमी जाना और उतना ही वापस जाना। रवि नगर से वायुसेना नगर होते हुए आकार नगर जाना होता था। बीच मे काफी चढ़ाई थी। खैर… सुबह और शाम दो बार जाना पड़ता था।
M Ed तो हो जाएगा उसके बाद क्या करना? इसलिए M Ed के दौरान additional B A किया english literature में। M Ed के बाद M A English में एडमिशन लिया कैंपस में। इस वर्ष (1999-2000) पॉलीटेक्निक के स्टडी सेंटर में जॉब मिली रामदास पेठ में। यहाँ तीन बार जाना पड़ता था 2-2 घन्टो के लिए। बचा हुआ समय कॉलेज जाने, होस्टल में खाना बनाने, कोचिंग के पेपर चेक करने और 12 के एक बच्चे की ट्यूशन लेने में जाता था। यह शायद कम था कि होस्टल वालो ने स्टूडेंट्स एसोसिएशन का अध्यक्ष भी बना दिया। यह अध्यक्ष यूनिवर्सिटी की अलग अलग चार होस्टल्स को मिलकर चुना जाता था जिसमे गर्ल्स होस्टल्स भी शामिल थी। खैर… सुबह 5 से रात 1 बजे तक काम चलता था। आज, जब भी कभी थकान महसूस करता हु तो यह एक वर्ष मुझ में हमेशा ऊर्जा संचारित करता है।
मेरा एडुकेशन में NET december 1999 में हुआ फिर प्राइवेट B Ed कॉलेज में नौकरी लगी। साथ मे M A English चल रहा था। दरमियाँ मैंने additional B A भी कर लिया history में। अगले वर्ष फिर अच्छे नौकरी की तलाश शुरू हो गई। अब तक english MA हो गया था। अमरावती में चिखलदरा स्थित मिलिट्री स्कूल के इंटरव्यू के लिए गया उसमे मेरा चयन हो गया TGT Maths के लिए। यह बिना donation का जॉब था। यहाँ रहकर मैंने additional B Ed (Eng) में पूरा किया और M A History का प्रथम वर्ष भी। इनकी परीक्षाओं के लिए 235 किमी और करीबन 10 घंटो का सफर तय करना पड़ता था क्योंकि सेंटर नागपुर था।
जनवरी 2002 में NCERT का कॉल आया। कोई तैयारी नही थी। एडुकेशन लगभग भूल चुका था। सोचा NCERT की इंटरव्यू कैसी होती है यही देखकर आऊंगा। इंटरव्यू 70-80% ठीक रही। कुछ दिनों बाद लेटर आया कि मुझे NCERT में RIE Bhopal के लिए चुन लिया गया है। जाहिर है खुशी का ठिकाना नही रहा होगा। जनवरी में सिलेक्शन हुआ पर जॉइन करते करते सितंबर हो गया। दरमियाँ KVS की PGT Eng भी मैंने क्लियर कर ली थी। पर वर्तमान जॉब में केवल जॉइन करना बाकी था इसलिए मैंने उसका इंटरव्यू नही दिया।
16 सितंबर को RIE में जॉइन किया। यहाँ से नागपुर आना जाना करके M A History पूरा किया।
मई 2003 में शादी हुई। डॉ प्रविनि की पढ़ाई मुझसे भी जादा है। हर मामले में वो एक काबिल इंसान है। मेहनत करने की प्रेरणा मुझे उनसे ही मिलती है।
2004 में महक आई। गाना बहुत अच्छा गाती है। इंग्लिश पर मजबूत पकड़ है। और भी बहुत सी खूबियां है में। अपने नाम के जैसे महकते रहती है। अभी 8 वी में है।
प्रजय का आगमन 2007 में हुआ। पढ़ाई में तेज है पर करने का मन नही होता इनका। अबतक टॉपर्स में ही रहे है। 4 में आते आते कई सर्टिफिकेट्स प्राप्त कर लिए है। एक बार साइंस ओलिंपियाड जीता और दो बात स्पेल बी कंपीटिशन में स्टेट लेवल तक पहुंच चुके है। इस बार नेशनल का ध्येय है। खेल के प्रति दीवानगी है। दोनों ही टेक्नोलॉजी के दीवाने भी है।
मैं अपनी सम्पूर्ण जिंदगी से बहुत खुश हूं। कही कोई गिला शिकवा नही है। समाज के लिए जो भी कर सकता हु करने की कोशिश करता हु। मैं जो कुछ भी हु आज वो नागपुर के होस्टल के कारण हु और इस समाज के….

बाकी की लाइफ लगभग आप लोग जानते ही हो। कोई सवाल हो तो बेझिझक पूछिये।
धन्यवाद! (पढ़ने के लिए बहुत समय लगेगा।)

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सही श्रद्धान्जलि

बुद्धवासी द्रौपदीबाई पंडागले (मेरी दादी) का देहांत ६ नवम्बर २०१५ को हुआ। उस समय उनकी आयु ९५ के करीब थी। उनके अंतिम समय में बड़े पिताजी का परिवार, मेरा परिवार तथा बड़ी बुवां ने उनकी सेवा की। अन्य सदस्य गांव से दूर होने के कारन चाह कर भी उनकी सेवा नहीं कर पाये उनमे मैं भी शामिल हु।

आज उनकी प्रथम बरसी है। पापा और उनके भाई (मेरे चाचा और ताऊ) चाहते है की आज के दिन समाज के लोगो को खाना खिलाया जाये। इस संदर्भ में मेरी बात मेरे भाई (आनंद) से हुई। उसने जो कहा उससे मैं सोचने पर मजबूर हो गया, हालाँकि मेरी भी यही सोच है फिर भी।

आनंद : भाई उनके मृत्यु के पहले जो करना था किया। अब किसी को खाना खिलाने से क्या हांसिल होगा? मैं तो इस बात के खिलाफ हु। उससे अच्छा उनके नाम पर गांव के स्कूल को कुछ रकम योगदान के रूप में दी जा सकती थी। मेरी हालत इतनी अच्छी नहीं अभी वर्ना मैं ही यह घोषित कर देता।

उसकी बात में दम तो था। मैंने सोचा, वो नहीं तो मैं सही। अत: मैं यह घोषित करना चाहता हु की मेरे गांव की स्कूल, जहा मैं भी पढ़ा हु, में हर कक्षा में प्रथम आने वाले को कुछ रकम प्रोत्साहन के रूप में दी जाए। इसका सारा खर्च मैं वहन करूँगा। इस योजना का नाम हो ‘द्रौपदीबाई पंडागले पुरस्कार’।

माना की यह निर्णय भावनिक है। पर यह भी मानता हु की हर भावनिक निर्णय गलत नहीं होता। साथ ही यह भी कहना चाहता हु की जब मैं इस दुनिया को अलविदा कहु मेरे नाम से भी ऐसा ही कोई पुरुस्कार दिया जाए जिससे समाज का भला हो। बाकी किसी कर्मकांड की जरुरत नहीं।

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Pandagale family dance on Zingaat song…

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इतना नादाँ भी नहीं

इतना नादाँ भी नहीं की समझ ना सकु
पर अपनों से ठोकर खाना गवारा नहीं मुझे।

कभी हमारी छोटी सी ख़ुशी पर कितना इठलाते थे वो
आज असीम दुःख की सुध भी नहीं उन्हें।

विश्वास पे तो दुनिया कायम है
हमने किया तो क्या बुरा किया?

होंगी उनकी भी कुछ मजबूरिया
पर वाकई हमारे समझ से परे है वे।

समय ने बहुत कुछ सिखाया अब तक
चलो इस सिख को भी आजमा ही लेते है।

इतना नादाँ भी नहीं की हां में हां मिला ना सकु
पर अपनों को ठोकर खाते देखना गवारा नहीं मुझे।

  • संजय कुमार पंडागले
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अंधविश्वासी महिलाओं की गोद भरता बाबा

विगत दिनो लखनऊ के करीब बाराबंकी में एक संत बाबा परमांनंद उर्फ राम शंकर तिवारी उम्र लगभग 65 वर्ष सुर्खियों मे है। उन पर आरोप है की उसने महिलाओं की गोद भरने की आड़ में बलात्कार किया और उनकी सेक्स वीडियो बनाया। ये भेद न खुलता यदि उसका लेपटाप खराब न होता। कम्पयूटर इंजीनियर ने जब लैपटॉप सुधारने के दौरान उस वीडियो क्लिप को देखा तो हैरान रह गया। उसमे करिब 200 महिलओं के साथ सेक्स वीडियो थे। उसने कुछेक वीडियो को सोशल साईट पर अपलोड कर दिया। इसके बाद हल्ला  मचा और पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। सोशल मीडिया मे तैर रहे इन तमाम वीडियो मे से कुछ वीडियो को देखने के बाद मन विचलित हो जाता है और मन सोचने के लिए मजबूर होता है कि हमारा जन समुदाय किस ओर जा रहा है। हमारी शिक्षा का क्या औचित्य है?

गौरतलब है कि बाबा परमानंद संतान प्राप्ति सुख देने के लिए विख्यात है खास कर पुत्र प्राप्ति हेतु। दावा है कि वैदिक रीति से तंत्र–मंत्र की साधना करते है। कई केन्द्रीय और राज्य  के मंत्री  उनके मुरीद है। उनके आश्रम (अय्याशगाह) में लगी इन हस्तियो के साथ तस्वीर को देखने से उनके राजनीतिक और समाजिक हैसियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। इन वीडियो को देखने से कही से भी ये नही लगता की यह कोई बलात्कार है, ऐसे ही एक वीडियो में एक युवती अपने अद्योवस्त्र उतारा रही है और बाबा परमानंद के अंत:वस्त्र उतारने में मदद कर रही है। बाबा लेटे हुये है युवती मुख मैथुन कर रही है। तत्पश्चात बाबा उसे बाकी वस्त्र  भी उतारने का इशारा करते है वह बिना संकोच शेष वस्त्र  भी उतार देती है। गौर तलब है की इसी दरमियान भजन गायन की ध्वनी सुनाई पड़ रही है। महसूस होता है की दूसरे कमरे मे काफी लोग भजन गा रहे है और बीच बीच मे देवी देवताओं, बाबा परमानंद की जय के नारे भी  लगा रहे है। इसी बीच बाबा युवती को अपने उपर आने का इशारा करते है उसके नाज़ुक अंगो को छेड़ते है बाद में बाबा युवती के उपर आ जाता है। करीब 24 मिनट के इस वीडियो में मैथुन पश्चात बाबा खड़ा हो जाता है युवती उसे उसके अंत:वस्त्र पहनने के लिए देती है और अपने अंत:वस्त्र पहनती है। बताना चाहूंगा की महिला के वस्त्र  पहनने के दौरान लेटा हुआ बाबा उसके नाजुक अंगो मे, सिर व चहरे पर लात फेर रहा है। मानो वह कोई पालतु जानवर हो। आश्रम का वह कमरा जहां यह स्केण्डल हो रहा है निहायत ही छोटा है देवी देवताओं की तस्वीर और धार्मिक किताबों से अटा पड़ा है। किताबों के बीच लगे सी सी टीवी कैमरे से ये सब सूट किया जा रहा था। यह सब विस्तांर से बताने का मकसद यह है की वीडियो में कोई जोर जबरदस्ती नही है, जैसा की प्रचारित किया जा रहा है। अन्य  वीडियो मे भी इसी प्रकार की प्रक्रिया नजर आती है। महिला बदल जाती है कभी सलवार सूट मे तो कभी साड़ी मे। ये वीडियो इस लिए विचलित कर देने वाला है क्योकि बाबा परमानंद के साथ सेक्स  कर रही महिलाएं कोर्इ सेक्स वर्कर नही है, आम उच्च  मध्यम परिवार की है। बावजूद इसके वे इसका विरोध नही कर रही है इस लिहाज से बाबा आरोपी बिल्कुल भी नही क्योकि कानून, सहमती के साथ किये गये संबंध की इज़ाजत देता है।

यह सब ऐसे देश मे हो रहा है जहां महिलाएं घर से बाहर अकेले नही  निकलती। कोई अगर घूर कर देख भी ले तो लोग मरने माने को उतारू हो जाते है। निश्चय ही बाबा के आश्रम में आने के लिए उस महिला ने अपनी मां, बहन, भाई, सास, ननद, पति, देवर, देवरानी, जेठानी का सहारा लिया होगा। यानि उस दौरान जब वो बाबा के साथ समागम कर रही होगी तब निहायत ही करीबी रिश्तेदार बगल के कमरे में बाबा परमानंद की जय के नारे लगा रहा होगा या भजन में लीन रहा होगा।

यह तो तय है की ये घटना पहली नही है नही ये घटना आखरी है। क्योकि जब तक धर्म के लिए अंधभक्ति रहेगी। तब तक आशाराम, परमानंद, नित्या नंद जैसे लोग अपनी इच्छा तृप्ती करते रहेगे। गौर तलब है की ये समस्या किसी विशेष धर्म तक सीमित नही है धर्म के ठेकेदार किसी न किसी रूप से अपने भक्तो  का शारीरिक मानसिक एवं आर्थिक शोषण करते रहते है।

क्यो होता है ऐसा?

ऐसे समय जब पाश्चात्य विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है। एक ओर भारत मे ही 70 वर्ष की महिला को चिकित्सा  विज्ञान के सहारे संतान सुख प्राप्त होने के उदाहरण मौजूद है। वहीं दूसरी ओर एक मर्द को भी बच्चे जन्म  देने का मौका मिल चुका है। ऐसी स्थिति में भारत में आये दिन ऐसी खबरे आना दुखद है। भारत का जनमानस अंधविश्वास से उबर नही पा रहा है। प्रशासन को इस पर गहराई के विचार करना होगा। हमे यह सोचने पर महबूर होना होगा की हमारी शिक्षा का क्या औचित्य है? क्या हम धार्मिक अंधविश्वास के तले आधुनिक शिक्षा को रौद रहे है? संत बाबा परमानंद से समागम करती ये महिलाएं खूबसूरत है संभ्रात परिवार की लगती है। निश्चिय ही वे पढ़ी लिखी होगी उनका परिवार भी शिक्षित होगा। तो फिर उस परिवार ने कैसे संतान प्राप्ती के लिए झाड़ फूक यज्ञ हेतु अपनी महिलाओं को सौप दिया।

पहलू और भी है
ऐसे देश पर जहां महिलाओं पर अत्यंत रोक टोक की जाती है उन्हे महिनो चाहर दिवारी मे कैद रखा जाता हे वही दूसरी ओर ऐसे आश्रमो में जाने की खुली छूट रहती है। भारत में आज भी संतान के लिए महिलाओं को जिम्मेदार माना जाता है, नि:संतान होने पर तरह तरह से जलील किया जाता है। यातनाएं दी जाती है।
पारिवारिक, समाजिक तानो से उसका जीवन नर्क बना दिया जाता है। इन वीडियो को देखने से लगता है कि इन नरक भरी ज़िन्दगी से उबरने के लिए यदि किसी महिला को ये सब करना पड़ रहा हो, तो शायद इतना बुरा  नही है। जिना समझा जाता रहा है क्योकि ऐसा करने के लिए उसी के परिवार ने, समाज ने मजूबर किया है।
यह अप्रकाशित आलेख आपको प्रकाशन के लिए भेज रहा हूँ, लेख के साथ मेरा ईमेल भी प्रकाशित करेगे तो मुझे खुशी होगी।

भवदीय
संजीव खुदशाह
Sanjeev Khudshah
http://www.sanjeevkhudshah.com/
(संक्षिप्त परिचय:-संजीव खुदशाह का जन्म 12 फरवरी 1973 को बिलासपुर छत्तीसगढ़ में हुआ। आपने एम.ए. एल.एल.बी. तक शिक्षा प्राप्त की। आप देश में चोटी के दलित लेखकों में शुमार किये जाते है और प्रगतिशील विचारक, कवि,कथा कार, समीक्षक, आलोचक एवं पत्रकार के रूप में जाने जाते है। आपकी रचनाएं देश की लगभग सभी अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। “सफाई कामगार समुदाय” एवं “आधुनिक भारत में पिछड़ा वर्ग”  आपकी चर्चित कृतियों मे शामिल है। आपकी किताबें मराठी, पंजाबी, एवं ओडिया सहित अन्य भाषाओं में अनूदीत हो चुकी है। आपकी पहचान मिमिक्री कलाकार और नाट्यकर्मी के रूप में भी है। आपको देश के नामचीन विश्वविद्यालयों द्वारा व्याख्यान देने हेतु आमंत्रिीत किया जाता रहा है। आप कई पुरस्कािर एवं सम्मान से सम्मानित किए जा चुके है।)

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शादी: कुछ सोचनीय सवाल

हमारे देश में वैसे तो कई त्यौहार तथा प्रसंग बड़े धूम धाम से मनाए जाते है। पर शादिया शायद कुछ जादा ही धुमधाम से मनाई जाती है। केवल सामान्य धूमधाम ही नहीं, शादियों में रीती रिवाजो की भी धूमधाम होती है। ऐसे में कई सवाल मन में आते है। हमने कई दिनों से किसी विषय पर चर्चा नहीं की। तो क्यों ना आज इसी पर चर्चा की जाये। चर्चा के लिए कुछ मुद्दे छोड़े जा रहा हु। जब समय होगा मेरे पास तो मैं भी जुड़ जाऊंगा चर्चा में। इस विषय के मुद्दे बनाने में ही काफी समय लग गया मुझे। अत: इसे केवल चर्चा की दृष्टी से ही ना देखे। क्योंकि केवल हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ….. बाकी आप सब समझदार हो। चर्चा के मुद्दे कुछ इस तरहा से है –

१. शादी सबकी सुविधा ध्यान में रखकर करनी चाहिए या शुभ मुहूर्त देख कर?

२. शुभ मुहूर्त कैसे देखा जाता है? मतलब इसका आधार क्या है?

३. लड़की की महत्वपूर्ण परीक्षा है शिक्षा की फिर मुहूर्त के नाम पर परीक्षा के दरमियान शादी करना, कहा तक उचित है?

४. शादी में दहेज़ देना या लेना जरुरी है क्या?

५. दहेज़ लेकर दूल्हे को अपने बिकने का अहसास नहीं होता होगा क्या?

६. जब शादी ऊपर वाला तय करता है तो फिर दहेज़ देना या लेना क्यों? शुभ मुहूर्त की भी जरुरत क्यों?

७. कुंडली देखना जरुरी है क्या? अगर हा, तो इसके कारन बताइए।

८. क्या भारत में कभी भी आसानी से किसी भी जाती में शादी करना संभव हो पाएगा?

९. शादी के बाद आदमी में तो कोई परिवर्तन नहीं लाया जाता तो फिर महिला में ही क्यों? जैसे की दोनों हाथो में कोहनी तक चूड़िया, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, आदि। क्या महिला को यह गुलामी की निशानी नहीं लगती होगी? या उसने इस बात पर कभी गौर ही नहीं किया? या यह एक उचित रिवाज है?

१०. घर में किसी की मृत्यु हो जाए तो शादी को एक साल तक आगे धकेलना, फिर किसी और की मृत्यु हो जाये तो फिरसे आगे धकेलना। ऐसे में खास कर लड़की के शादी पर कोई दुष्परिणाम तो नहीं होता होगा?

११. शादी में शामिल मेहमानों को खाना खिलाने के अलावा अन्य चकाचौंध और खर्चे जरुरी है क्या?

१२. शादी दो परिवारों के बिच होती है। आदमी और औरत दोनों की आवशकता है। तो फिर लड़की वालो को ही क्यों झुकना पड़ता है ?

१३. शादी तो लड़की की भी होती है तो उसे जीवन भर जिसके साथ रहना है उसे चुनने का अधिकार उसे क्यों नहीं दिया जाता?

और भी ऐसे कई सवाल मेरे मन में अक्सर उठते रहते है। यह सवाल मेरे वैयक्तिक सवाल है जो समाज को अवलोकित करने के पश्चात मेरे मस्तिष्क में उठते रहते है। ये रीतिरिवाज किसी एक जाती विशेष या समुदाय विशेष से जुड़े हुए नहीं है। अपितु सम्पूर्ण भारतीय समाज से जुड़े है। अत: इनके जवाब कृपया भावना में बहकर नहीं परन्तु तर्क के आधार पर दे। किसी भी जाती का उल्लेख ना करे। और केवल जवाब देकर शांत ना बैठे। हो सके तो इन्हे अपने जीवन में ढाले।

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